5-स्टार होटल से लेकर सील इमारतों तक मेहरबानी, टिहरी में अधिकारी दिग्विजय नाथ तिवारी पर गंभीर आरोप।
बिना ₹72 लाख की बैंक गारंटी पास कर दिया नक्शा! जानिए टिहरी में कैसे हुआ करोड़ों का घपला।…..

उत्तराखंड के टिहरी जिला स्तरीय विकास प्राधिकरण से एक बेहद सनसनीखेज और बड़ा मामला सामने आया है! प्रतिनियुक्ति (deputation) पर तैनात अधिकारी दिग्विजय नाथ तिवारी पर पद का दुरुपयोग कर करोड़ों रुपये का वित्तीय नुकसान पहुंचाने और अवैध निर्माणों को शह देने के संगीन आरोप लगे हैं।हैरान करने वाली बात यह है कि विभागीय इंजीनियरों की लिखित शिकायतों और मंत्री जी की बैठक के बावजूद इस अधिकारी के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। आखिर कौन बचा रहा है इस आरोपी अधिकारी को?जिला स्तरीय विकास प्राधिकरण, टिहरी में तैनात सहायक अभियंता पंकज पाठक ने उपाध्यक्ष और उच्च अधिकारियों को शिकायत भेजकर भ्रष्टाचार के एक बड़े खेल का पर्दाफाश किया है। आरोप है कि प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत दिग्विजय नाथ तिवारी ने प्राधिकरण के नियमों को ताक पर रखकर नक्शे पास किए और शासन को करोड़ों की चपत लगाई।

पार्क और खुले स्थल की जमीन पर खेल:
फाइल संख्या TSN/CR/0002/24-25: पहले जिस फाइल को कृषि भूमि बताकर रिजेक्ट किया गया था, बाद में उसे मास्टर प्लान से बाहर दर्शाकर पास कर दिया गया जबकि असलियत में वह जगह पार्क और खुले स्थल के अंतर्गत आती थी!
₹1.46 करोड़ का वित्तीय घाटा (मनोज कुमार गुप्ता मामला):
फाइल संख्या TSN/NC/0004/24-25/RE1: चम्बा का मास्टर प्लान छिपाया गया। 2000 वर्ग मीटर से अधिक के भूखंड पर लिया जाने वाला ₹1.46 करोड़ का भू-उच्चीकरण शुल्क नहीं वसूला गया, जिससे प्राधिकरण को सीधे तौर पर करोड़ों की हानि हुई।
₹72 लाख की बैंक गारंटी बिना जमा किए नक्शा रिलीज:
फाइल संख्या TSN/L/0001/24-25 (कमल कांत मलिक)– ले-आउट नियमावली (भवन उपविधि) के तहत ₹72 लाख की बैंक गारंटी ली जानी अनिवार्य थी। लेकिन बिना बैंक गारंटी लिए ही नक्शा रिलीज कर दिया गया!
₹2.18 करोड़ की एक और वित्तीय हानि (पीयूष अग्रवाल मामला)
फाइल संख्या TSN/NC/0014/23-24 (ग्राम कौड़ियाला)– नगर निकाय क्षेत्र से बाहर 2000 वर्ग मीटर से अधिक भूमि का मामला। नियमों के तहत ₹2.18 करोड़ का शुल्क छिपा लिया गया और अनाधिकृत रूप से स्वीकृति दे दी गई।
5/7 स्टार होटल का नक्शा घोटाला (मुनि की रेती)
मुनि की रेती क्षेत्र में 5/7 स्टार होटल का नक्शा गलत भू-उपयोग (land use) दिखाकर मंजूर किया गया, जबकि मुख्य नगर नियोजक (CTP) द्वारा उस स्थल को पार्क व खुला स्थल दर्ज किया गया था।

नरेंद्रनगर तहसील क्षेत्र में अवैध निर्माणों पर कोई सीलिंग की कार्रवाई नहीं की गई। हद तो तब हो गई जब पूर्व में सील की गई इमारतों में भी खुलेआम काम कराया जा रहा है! इतना ही नहीं, शिकायतकर्ता अभियंता का आरोप है कि बैठक में सच बोलने पर उन्हें जान से मारने तक की धमकी दी गई और झूठी शिकायतें दर्ज कराकर उन्हें डिमोरालाइज़ और प्रताड़ित करने का षड्यंत्र रचा जा रहा है! सवाल यह उठता है कि क्या प्रतिनियुक्ति पर आए अधिकारी को मनमानी करने की छूट दे दी गई है? मंत्री सुबोध उनियाल जी की बैठक के बाद और विभागीय इंजीनियरों के विरोध के बावजूद दिग्विजय नाथ तिवारी पर अब तक कोई सख्त एक्शन क्यों नहीं हुआ?…

फिलहाल, इस पूरे भ्रष्टाचार प्रकरण की निष्पक्ष जांच और आरोपी अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग सचिव (आवास विभाग, उत्तराखंड शासन) और जिलाधिकारी टिहरी गढ़वाल से की गई है। अब देखना यह होगा कि शासन-प्रशासन इस करोड़ों के घोटाले पर क्या कार्रवाई करता है या फिर फाइलें ऐसे ही धूल फांकती रहेंगी।

